।। ध्यान ।।
दीक्षा के समय गुरु शिष्य के अन्तर में प्रविष्ट होकर अंतर्यामी रूप से शब्द ब्रम्हमय ज्ञान का दान करता ह गुरूजी के चरणों को लक्ष्य में रखना ,ध्यान करते करते मणिवत ,स्फटिक मणि के समान दसो नख हो जाते है,तब ग्रंथि,संशय दूर हो जाते है। स्व का अध्ययन ही ध्यान है।उस परमतत्व की ओर जहाँ …
