अद्भुत गीता

योगभ्रष्ट की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा [ श्रीमद्भागवत गीता ] अर्जुन उवाचअयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥भावार्थ : अर्जुन बोले- हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग …

कृष्णात्मा

कृष्ण नाम आत्मा का है।जिसने सबको आकर्षित किया है।धारण किया है। हमारा पद जो है-आत्मा है।वो आत्मदेव है। इस आत्मदेव से बढ़कर कोई देव नहीं है।जो हमारे भीतर है। वो सूर्य की तरह प्रकाशित है।अनन्त सूर्यों का सूर्य है। वो तुम्हारा आधार है।वही सत्ता है।वह सत है।और कुछ नहीं। वो दिखे या न दिखे,उसको स्मरण …

Labyrinth Life

Haven’t we heard about Abhimanyu, in the grand epic of Mahabharat. His life’s spiritual significance shall be unveiled here. Sri Krishna helped His sister to elope with Arjun, despite Balaram Ji wanted her to be marry someone else. Sri Krishna wanted her to get married with the most virtuous being on the planet.(1) She bore …

ढाई अक्षर प्रेम का या तीन पद से युक्त ऐसा शब्द। जिसे गायत्री कहा गया।जिसका आकार बना दिया गया।जिसकी कोई आवश्यकता नहीं है। पद जो होता है,उसका कोई नाम नहीं। ॐ को ही कहा गया। वो आत्मदेव है। जो अपने में स्थित है।स्थिर है। स्वयं ज्योति है।सूर्य का वर्ण है।स्वर्ण जैसा। वही हमारे अंदर-बाहर,ऊपर-नीचे है।और …