एकत्व

भक्त भक्ति भगवंत गुरु चतुर नाम बपु एक। इनके पद बंदन किए नासहिं बिघ्न अनेक॥ भगवान् श्री राम हनुमान जी से पूछते है-हे हनुमान ,मुझमे और तुझमे क्याअंतर है? हनुमान जी कहते है -प्रभु लौकिक दृष्टी से आप स्वामी मै सेवक, आप भगवान मै भक्त हूँ ! और तात्विक दृष्टी से जो आप है वही …

एकत्व

भक्त भक्ति भगवंत गुरु चतुर नाम बपु एक। इनके पद बंदन किए नासहिं बिघ्न अनेक॥ भगवान् श्री राम हनुमान जी से पूछते हैं-हे हनुमान ,मुझमें और तुझमें क्या अंतर है? हनुमान जी कहते हैं -प्रभु! लौकिक दृष्टी से आप स्वामी, मैं सेवक, आप भगवान मैं भक्त हूँ ! और तात्विक दृष्टी से जो आप हैं …

निर्लिप्तता

[श्रीकृष्ण[गीता ] व श्री सद्गुरुजी के प्रवचन पर आधारित ]- 1.मन का बाहर किसी [ व्यक्ति या पदार्थ ] में लिप्तता या लगाव, किसी प्रकार का भी आदत जिसके न मिलने पर मन अशांत,बेचैन होता हो ,यही मन का विकार ग्रस्त [बीमार] होना है ! अर्थात मनोरोग है ! 2.स्वस्थ वही है जो आत्मस्थ है …

सर्वं खल्विदं ब्रह्मम्

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ! नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:!! -अर्थात हे दिव्य शक्ति [Divine Energy] जो सभी भूतो [चराचर प्राणी] में शक्ति रूप में संस्थिता अर्थात समान रूप से स्थित है,उस दिव्य शक्ति को मै नमन करता हूँ! –जिसकी चेतना से हम सब, अखिल ब्रम्हांड ,सम्पूर्ण चराचर चैतन्य है, प्रकाशित है ,सुगन्धित है …

सर्वं खल्विदं ब्रह्मम्

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ! नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:!! -अर्थात हे दिव्य शक्ति [Divine Energy] जो सभी भूतो [चराचर प्राणी] में शक्ति रूप में संस्थिता अर्थात समान रूप से स्थित है,उस दिव्य शक्ति को मै नमन करता हूँ! –जिसकी चेतना से हम सब, अखिल ब्रम्हांड ,सम्पूर्ण चराचर चैतन्य है, प्रकाशित है ,सुगन्धित है …

अभ्यास

—-ये जो बीज [दीक्षा ] दिया गया है,ब्रम्ह विद्या दी गई है, धीरे-धीरे अभ्यास करते हुए,उपरामता को प्राप्त कर ,धैर्ययुक्त बुद्धि से मन को परमात्मा-अंतरात्मा में स्थिर करते हुए,दूसरे विचारों को मन में न आने दो ,इससे सारे क्लेश,कर्म,विपाक ये सब साफ होते जाते है।—मेरी ही प्रीति बनी रहे/रहेगी।दृश्य या ध्वनि होते हुए भी मन-बुद्धि …

अभ्यास

—-ये जो बीज [दीक्षा ] दिया गया है,ब्रम्ह विद्या दी गई है, धीरे-धीरे अभ्यास करते हुए,उपरामता को प्राप्त कर ,धैर्ययुक्त बुद्धि से मन को परमात्मा-अंतरात्मा में स्थिर करते हुए,दूसरे विचारों को मन में न आने दो ,इससे सारे क्लेश,कर्म,विपाक ये सब साफ होते जाते है।—मेरी ही प्रीति बनी रहे/रहेगी।दृश्य या ध्वनि होते हुए भी मन-बुद्धि …

अद्भुत गीता

योगभ्रष्ट की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा [ श्रीमद्भागवत गीता ] अर्जुन उवाचअयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥भावार्थ : अर्जुन बोले- हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग …

कृष्णात्मा

कृष्ण नाम आत्मा का है।जिसने सबको आकर्षित किया है।धारण किया है। हमारा पद जो है-आत्मा है।वो आत्मदेव है। इस आत्मदेव से बढ़कर कोई देव नहीं है।जो हमारे भीतर है। वो सूर्य की तरह प्रकाशित है।अनन्त सूर्यों का सूर्य है। वो तुम्हारा आधार है।वही सत्ता है।वह सत है।और कुछ नहीं। वो दिखे या न दिखे,उसको स्मरण …

ढाई अक्षर प्रेम का या तीन पद से युक्त ऐसा शब्द। जिसे गायत्री कहा गया।जिसका आकार बना दिया गया।जिसकी कोई आवश्यकता नहीं है। पद जो होता है,उसका कोई नाम नहीं। ॐ को ही कहा गया। वो आत्मदेव है। जो अपने में स्थित है।स्थिर है। स्वयं ज्योति है।सूर्य का वर्ण है।स्वर्ण जैसा। वही हमारे अंदर-बाहर,ऊपर-नीचे है।और …