राबिया बसरी और हसन बसरी
कहानी
एक बार की बात है। राबिया बसरी जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठी थीं। उनके चारों ओर जंगल के सारे पशु-पक्षी भी आकर बैठ गए थे।
वहाँ कोई आवाज़ नहीं थी। राबिया कुछ बोल नहीं रही थीं, और न कोई पक्षी चहक रहा था, न कोई पशु हिल रहा था। सब शांति, प्रेम और आनंद में डूबे थे। राबिया कुछ कर भी नहीं रही थीं। बस थीं, और उनके होने से ही पूरा जंगल ठहर गया था।
कुछ देर बाद उसी रास्ते से एक और संत आए, हसन बसरी। जैसे ही उन्होंने जंगल में क़दम रखा, सारे पशु-पक्षी घबराकर भाग खड़े हुए। पक्षी उड़ गए, जानवर छलाँग मारकर झाड़ियों में गुम हो गए, और पल भर में वह जगह सूनी हो गई।
हसन हैरान रह गए। उन्होंने राबिया से पूछा, “यह क्या बात है? जब तुम बैठी थीं, तो सब तुम्हारे पास शांत बैठे थे। मैं आया तो सब भाग गए। ऐसा क्यों हुआ?”
राबिया मुस्कुराईं और बोलीं, “यह सवाल मुझसे नहीं, अपने आप से पूछो। भीतर जाकर पूछो।”
कहानी की सीख
मौन में आत्मा का संगीत…
राबिया जी सिट कर रही थीं एक ट्री के अंडर,
जंगल के सारे एनिमल वहीं सिटिंग थे, बट नहीं था कोई बवंडर।
जंगल में था बड़ा सन्नाटा और थी मस्ती की शांति,
राधा, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, नानक, मीरा की कांति।
सबका मन छुप्पी कर गया था आत्मा के पिट्टू में,
वही मन की ऊर्जा जो भड़भड़ाती रहती थी या रहती थी गोल-गोल लट्टू में।
ना वहाँ प्यास थी, ना आस थी, ना कयास था, ना अभ्यास था,
करवा सारे अलग थे पर अंदर बस उपवास था।
ना कोई उदास था, ना परिहास था, ना कोई बदहवास था,
बस या रब का निवास था और आनंद का आकाश था।
हसन की सांस में ही पीड़ा का एहसास था,
वहाँ भय का त्रास था, हिंसा का इतिहास था।
हम सीख गए इस कहानी से, कि मन का आत्मा से रास हो,
सच्चे संन्यास का प्रकाश हो,
एकता की प्रेम भरी सुवास हो।
आत्मीयता की मिठास हो,
बस होने का अवकाश हो,
खास आंतरिक उल्लास हो।
मासूमियत का पलाश हो।

