“अम्मा की कुर्ती और पैगंबर के कुर्ते को नहीं, असली कर्ता को पहचानिए।”
कहानी
मोहम्मद पैगंबर साहब रोज़ एक गली से गुज़रा करते थे। उस गली में एक मकान के ऊपर वाले हिस्से में एक बूढ़ी अम्मा रहा करती थीं। पता नहीं किस कारण से, वे रोज़ कचरा मोहम्मद पैगंबर साहब पर उड़ेल दिया करती थीं। पैगंबर साहब उनसे बिल्कुल भी नाराज़ नहीं होते थे। वे चुपचाप अपने घर जाकर ख़ुद को साफ़ कर लेते थे।
यह सिलसिला कई सालों तक रोज़ चलता रहा। न तो उस बुढ़िया अम्मा ने कचरा फेंकना बंद किया, न पैगंबर साहब ने उस रास्ते से जाना बंद किया। उनकी तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं होती थी। वे अपनी स्निग्ध, सौम्य मुस्कुराहट के साथ ही आया-जाया करते थे।
बहुत वर्षों के बाद एक दिन अम्मा ने उन पर कचरा नहीं फेंका। पैगंबर साहब ने आसपास के लोगों से पूछा कि अम्मा जी को क्या हुआ। लोगों ने बताया कि वे बीमार हैं। पैगंबर साहब उन्हें देखने गए। वे बहुत अस्वस्थ थीं और उठ-बैठ भी नहीं पा रही थीं। पैगंबर साहब ने उनकी सेवा की।
कुछ दिनों में जब उनका स्वास्थ्य ठीक होने लगा, तो अम्मा ने पहचाना कि यह तो वही व्यक्ति है जिस पर वे कचरा फेंका करती थीं। उनके मन में बहुत अपराध-बोध आया। उन्होंने कहा, “मैं कितनी ख़राब महिला हूँ। मैंने तुम पर इतना कचरा फेंका, और तुम मेरी सेवा कर रहे हो।”
पैगंबर साहब ने कहा, “कोई बात नहीं माँ। तुम तो माँ हो। तुमने तो हमेशा मुझे प्रेम ही किया है, और मैं तुम्हें प्रेम करके तुम्हारे उसी प्रेम को जी रहा हूँ।”
कहानी का सार
वह अल्लाह ही कर्ता है…
अम्मा की कुर्ती और पैगंबर के कुर्ते को नहीं,
असली कर्ता को पहचानिए।
मोहम्मद पुतले को ले जाया गया पतली गंदली राह पर,
अम्मा कठपुतली से उड़लवाया गया कचरा उनके कपाल पर।
रसूल के अंदर से वही मुस्कुराया,
अम्मा के भीतर से वही कुड़कुड़ाया।
नबी की गुदगुदाहट भी वहीं से आई,
जहाँ से माता राम की गुर्राहट आई।
पैगंबर मशीन से सेवा कार्य कराया,
अम्मीजान यंत्र पर अपराध बोध सजाया।
मुस्तफ़ा की सौम्यता का रंग उसी की सुराही का है,
अम्मा की कंझड़ता की गंध भी उसी के ड्रम की है।
अहमद के प्यार का खजाना वहीं खोजना होगा,
अम्मा के प्रायश्चित का स्रोत भी वहीं छिपा हुआ है।

