वैराग्यवती और चोर गुरु
कहानी
बहुत समय पहले की बात है। एक राज्य में एक राजकुमारी थी, जिसका नाम था वैराग्यवती। बचपन से ही उसका मन भक्ति और वैराग्य में रमा हुआ था। उसे भगवान के सिवा और कुछ नहीं चाहिए था।
राजा और रानी अपनी बेटी का स्वभाव भली-भाँति जानते थे। उन्होंने कभी उसे रोका नहीं, बल्कि उसकी भक्ति को आगे बढ़ाने में पूरा सहयोग दिया। राजकुमारी को महल के सुख-वैभव और ऐश्वर्य में कोई रुचि नहीं थी, इसलिए राजा ने महल के ही एक हिस्से में उसके लिए एक छोटा-सा कमरा बनवा दिया और कुछ सेवकों की व्यवस्था कर दी। वैराग्यवती वहीं रहती और दिन-रात भजन-कीर्तन में मन लगाए रहती।
एक रात वैराग्यवती अपने कमरे के बाहर बैठी थी। तभी चोरों की एक टोली वहाँ आई। उनका मुखिया आगे बढ़ा और बोला, “बेटी, मैं तुम्हारा गुरु हूँ।”
“गुरु” शब्द सुनते ही वैराग्यवती का हृदय खुशी से भर उठा। उसने बड़े आदर से उन्हें प्रणाम किया और आसन पर बिठाया। मुखिया ने कहा, “तुम बिल्कुल चुप रहना, मुँह से एक शब्द भी मत निकालना।” वैराग्यवती ने गुरु की आज्ञा मानकर मौन धारण कर लिया।
मुखिया उससे बातें करता रहा और इसी बीच उसकी टोली चुपचाप महल में घुस गई। जो भी कीमती सामान हाथ लगा, समेटकर चलते बने।
इसके बाद मुखिया ने कहा, “अब तुम मेरे साथ चलो। मैं जहाँ ले चलूँ, चलती रहना, पर आवाज़ मत करना।” वैराग्यवती उसे अपना सच्चा गुरु मान चुकी थी, इसलिए पूरे समर्पण के साथ पीछे-पीछे चल पड़ी।
महल से दूर जंगल में पहुँचकर मुखिया ने एक पेड़ के चारों ओर रस्सी से उसे बाँध दिया और बोला, “जब तक मैं स्वयं आकर न खोलूँ, तुम नहीं खुलोगी। किसी के भी कहने पर नहीं। यहीं बैठकर मन ही मन राम-राम का जाप करती रहना।” इतना कहकर वह वहाँ से चला गया।
सुबह हुई तो महल में हड़कंप मच गया। राजकुमारी कहीं नहीं मिल रही थी। राजा ने सिपाहियों को चारों दिशाओं में खोजने भेजा। आख़िर एक सिपाही ने उसे जंगल में पेड़ से बँधे देखा। उसने रस्सी खोलने की कोशिश की, तो वैराग्यवती बोली, “नहीं, मैं नहीं खुलूँगी। जब मेरे गुरुजी आएँगे, वही खोलेंगे।”
सिपाही ने दौड़कर राजा को खबर दी। राजा अपनी सेना के साथ स्वयं वहाँ पहुँचे और बेटी को समझाने लगे, पर वैराग्यवती ने पिता की बात भी नहीं मानी। बहुत प्रयास हुए, पर सब व्यर्थ गए।
तब स्वयं भगवान नारायण वहाँ प्रकट हुए और बोले, “बेटी, अब खुल जाओ।”
वैराग्यवती ने हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, मुझे आपके दर्शन मेरे गुरु की कृपा से ही हुए हैं। मुझे तो मेरे गुरु ही खोल सकते हैं।”
नारायण मुस्कुराए। उन्होंने ब्रह्मर्षि नारद को बुलाकर कहा, “जाओ, इसके गुरु को ढूँढकर लाओ।”
नारद जी चोर गुरु को खोजकर ले आए। नारद और नारायण उस पर नाराज़ होने लगे, “तुम कितने झूठे और चोर हो! तुमने इस भोली राजकुमारी को छल से इतना कष्ट दिया।”
यह सुनते ही वैराग्यवती बोल उठी, “नहीं-नहीं, आप मेरे गुरु को कुछ मत कहिए। इन्हीं की वजह से मुझे आपके और ब्रह्मर्षि नारद के दर्शन हुए हैं। ये मेरे सच्चे गुरु हैं।”
वैराग्यवती की ऐसी अटूट श्रद्धा देखकर चोर का हृदय पिघल गया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले। उस राजकुमारी की भक्ति के प्रताप से उस चोर को भी नारायण के दर्शन हुए और उसका जीवन बदल गया।
सीख — पहला अंदाज़
भक्ति, श्रद्धा और समर्पण…
वैराग्यवती थी एक मासूम राजकुमारी,
राजा रानी ने पहचानी अपनी पुत्री प्यारी।
भगवान की दुनिया तो है अड़बँगी न्यारी,
तम-रज-सत से सजी है यह फुलवारी।
माँ पिता बिटिया को रखे सुरक्षित सुकुमारी,
छोटा सा घर सुविधा देकर हुए उसकी भक्ति की बलिहारी।
एक दिन गुरु घंटाल प्रकट हुए लिए कहानी न्यारी,
चोरों की टोली सहित घुसे महल में जब रात हुई अंधियारी।
मुखिया चोर से दीक्षा पाकर भक्तिन ने अपना जीवन वारी,
प्रेम समर्पण आज्ञा पालन से तत्काल खुद को सँवारी।
जंगल में बंध कर वह गुरु की सदा ही बांट निहारी,
नारद नारायण हक्के-बक्के पर न चली किसी की होशियारी।
गुरु के साथ नारायण के दर्शन की कितनी सुंदर साझेदारी,
सीखा हमने आज्ञा पालन और अब नहीं करेंगे मक्कारी।
सीख — दूसरा अंदाज़
सीखने का एक और अंदाज़…
रानी का कमाल देखो, राजा की संभाल देखो।
कुमारी का धमाल देखो, चोर गुरु घंटाल देखो।
पेड़ की छाल से चिपकी बच्ची बेमिसाल देखो,
कंगाल चोर हुए झटपट मालामाल देखो।
नारायण का जाल और नारद हुए बेहाल देखो,
अनुकरण का प्यारा हाल और भक्ति की सुंदर चाल देखो।
प्रेम बड़ा विशाल और समर्पण फटे हाल देखो,
गुरु, नारद और गोपाल,
चेली का जवाब-सवाल देखो।
कपाल का माया-जाल हटा के प्रेम की टकसाल देखो।
खुशहाली व धन्यवाद से भरकर,
सारा आकाश-पाताल देखो।

